
डिजिटल दुनिया के चमकदार इंटरफेस के पीछे चल रही ‘रेवेन्यू रियलिटी’ पर अब सरकार की नजर सीधी पड़ चुकी है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने साफ शब्दों में कह दिया है, अगर प्लेटफॉर्म्स ने कंटेंट क्रिएटर्स के साथ कमाई का न्यायसंगत बंटवारा नहीं किया, तो कानून अपना रास्ता खुद बना लेगा।
DNPA Conclave 2026 में उनका लहजा कूटनीतिक कम, चेतावनी ज्यादा था। उन्होंने कहा कि इंटरनेट अब सिर्फ डेटा ट्रांसफर का जरिया नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली मीडिया इकोसिस्टम है और इकोसिस्टम में जिम्मेदारी ‘ऑप्शनल फीचर’ नहीं होती।
रेवेन्यू शेयरिंग: “Views आपके, मेहनत हमारी?”
वैष्णव ने सबसे अहम सवाल उठाया जो कंटेंट बनाता है, क्या उसे उसका वाजिब हिस्सा मिल रहा है? आज के डिजिटल दौर में न्यूज पब्लिशर्स, स्वतंत्र पत्रकार, प्रोफेसर, रिसर्चर, दूरदराज के वीडियो क्रिएटर्स सब प्लेटफॉर्म्स को ट्रैफिक, एंगेजमेंट और एड रेवेन्यू दे रहे हैं। लेकिन रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा किसके पास रहता है?
उन्होंने इशारों में नहीं, सीधे कहा अगर प्लेटफॉर्म्स स्वेच्छा से निष्पक्ष रेवेन्यू मॉडल नहीं अपनाते, तो कई देशों की तरह भारत भी कानूनी रास्ता अपना सकता है।
कंटेंट आपका, एल्गोरिदम हमारा, कमाई पूरी हमारी! यह मॉडल अब ज्यादा दिन टिकाऊ नहीं दिख रहा।
AI, Deepfake और ‘Synthetic Reality’ का खतरा
डिजिटल मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कमाई नहीं, भरोसा है। AI-generated synthetic content और deepfake तकनीक ने असली-नकली की रेखा धुंधली कर दी है। मंत्री ने सवाल उठाया बिना सहमति किसी न्यूज एंकर का चेहरा लगाकर प्रमोशनल वीडियो कैसे बन सकता है?
अगर एल्गोरिदम गलत कंटेंट को बढ़ावा देता है, बच्चों को हानिकारक सामग्री दिखाता है या अफवाहों को amplify करता है तो जवाबदेही किसकी होगी?

संदेश स्पष्ट “Host कर रहे हो, तो जिम्मेदारी भी लो।” सिर्फ ‘प्लेटफॉर्म’ कहकर पल्ला झाड़ना अब मुश्किल होगा।
ऑनलाइन सेफ्टी और एल्गोरिदमिक जवाबदेही
वैष्णव ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को याद दिलाया कि समाज में भरोसा हजारों साल की संस्थागत प्रक्रिया से बना है। अगर एल्गोरिदम उस भरोसे को तोड़ते हैं, तो नुकसान सिर्फ यूजर का नहीं, पूरी सामाजिक संरचना का होता है। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, साइबर फ्रॉड की रोकथाम, सिंथेटिक कंटेंट के लिए अनिवार्य सहमति इन मुद्दों पर उन्होंने सख्त स्टैंड दिखाया।
अब सिर्फ एग्जीक्यूटिव ही नहीं, ज्यूडिशियरी और संसदीय समितियां भी डिजिटल प्रभाव की समीक्षा कर रही हैं। यानी यह बहस अब ‘टेक बनाम मीडिया’ नहीं, ‘टेक + समाज + कानून’ का त्रिकोण बन चुकी है।
मीडिया का ‘Inflection Point’
वैष्णव ने इसे मीडिया की दुनिया का “Inflection Point” बताया। आज लिए गए फैसले आने वाले दशक की दिशा तय करेंगे। अगर क्रिएटर्स को उनका हिस्सा नहीं मिला, तो विज्ञान, साहित्य और कला का विकास बाधित होगा। और अगर भरोसा टूट गया, तो डिजिटल इकोसिस्टम की चमक भी फीकी पड़ जाएगी।
सरकार का संकेत साफ है—“Play fair, or prepare for regulation.” डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए यह सिर्फ चेतावनी नहीं, पॉलिसी-लेवल संकेत है।
अब ऐप नहीं लगाएगा ‘चुपके से टिक’: RBI ने दबाई चालाकी की ब्रेक
